Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 18, Verses 8–18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 18, verses 8–18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 8-18
संस्कृत श्लोक
परा नागरतोदेति महत्त्वगुणशालिनी ।
सा यया स्नेहमायान्ति राजानो अमरा अपि ॥ ८ ॥
पूर्वापरज्ञः सर्वत्र नरो भवति बुद्धिमान् ।
पदार्थानां यथा दीपहस्तो निशि सुलोचनः ॥ ९ ॥
लोभमोहादयो दोषास्तानवं यान्त्यलं शनैः ।
धियो दिशः समासन्नशरदो मिहिका यथा ॥ १० ॥
केवलं समवेक्ष्यन्ते विवेकाध्यासनं धियः ।
न किंचन फलं धत्ते स्वाभ्यासेन विना क्रिया ॥ ११ ॥
मनः प्रसादमायाति शरदीव महत्सरः ।
परं साम्यमुपादत्ते निर्मन्दर इवार्णवः ॥ १२ ॥
निरस्तकालिमारत्नशिखेवास्ततमःपटा ।
प्रति ज्वलत्यलं प्रज्ञा पदार्थप्रविभागिनी ॥ १३ ॥
दैन्यदारिद्र्यदोषाढ्या दृष्टयो दर्शितान्तराः ।
न निकृन्तन्ति मर्माणि ससंनाहमिवेषवः ॥ १४ ॥
हृदयं नावलुम्पन्ति भीमाः संसृतिभीतयः ।
पुरःस्थितमपि प्राज्ञं महोपलमिवेषवः ॥ १५ ॥
कथं स्यादादिता जन्मकर्मणां दैवपुंस्त्वयोः ।
इत्यादिसंशयगणः शाम्यत्यह्नि यथा तमः ॥ १६ ॥
सर्वदा सर्वभावेषु संशान्तिरुपजायते ।
यामिन्यामिव शान्तायां प्रजालोक उपागते ॥ १७ ॥
समुद्रस्येव गाम्भीर्यं धैर्यं मेरोरिव स्थितम् ।
अन्तः शीतलता चेन्दोरिवोदेति विचारिणः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
अर्थव्युत्पत्तिरूपी चतुरता भी इसका दूसरा फल है, ऐसा कहते हैँ ।
महत्त्वरूपी गुण से शोभित होनेवाली वह दूसरी चतुरता उत्पन्न होती है जिससे राजा
और देवताओं के तुल्य पूजनीय विद्वान् भी बड़ा प्रेम करते हैं । जैसे सुन्दर नेत्रवाला पुरूष रात्रि
के समय दीपक को हाथ में लेकर पदार्थों का ज्ञाता होता है वैसे ही उससे बुद्धिमान् पुरूष सर्वत्र
पूर्वापर का ज्ञाता हो जाता हे । जैसे शरद ऋतु से परिपूर्णं दिशा का कुहरा नष्ट हो जाता हे,
वैसे ही बुद्धि के लोभ, मोह आदि दोष शनैः शनैः अत्यन्त क्षीण हो जाते हैं । हे श्रीरामजी,
आपकी बुद्धि मलरहित (निर्मल) हो गई है, अब आपको केवल विवेकाभ्यास की अपेक्षा हे ।
अपने अभ्यास के बिना किया कुछ भी फल नहीं देता । विवेकाभ्यास से मन शरत्काल में
महान् सरोवर के तुल्य अतिप्रसाद से युक्त ओर मन्दर पर्वत से रहित समुद्र के समान क्षोभरहित
हो जाता हे । हे श्रीरामचन्द्रजी, इस ग्रन्थ के अभ्यास से जिसमें व्यामोहरूपी काजल की गन्ध
भी नहीं है ऐसी रत्नदीपककी लौ के समान जिसका अज्ञानरूप आवरण नष्ट हो गया हे अतएव
पदार्थो के विभाग से युक्त प्रज्ञा अत्यन्त देदीप्यमान हो जाती है जैसे कवच और शिरत्राण
आदि से सुसज्जित योद्धा को बाण छिन्न -भिन्न नहीं कर सकते, वैसे ही दीनता, दरिद्रता
आदि दोषों से भरी हुई दृष्टियाँ इस ग्रन्थ के अभ्याससे धन आदि विषयों मे असारता ज्ञात होने
के कारण मर्मच्छेदन नहीं कर सकती । प्रस्तुत ग्रन्थ का ज्ञाता भयहेतु ओं के सामने खड़ा क्यों
न हो, फिर भी जैसे बाण पत्थर की चट्टान को नहीं काट सकते वैसे ही भीषण सांसारिक भय
उसके हृदय को पीडित नहीं कर सकते। क्रमशः देव ओर पौरुष की प्रधानता के हेतु जन्म ओर
कर्मो की आदिता कैसे होगी अर्थात् संसार में जन्म के प्रथम होने पर पौरुष की प्रधानता ओर
कर्म के प्रथम होने पर दैव की प्रधानता कैसे होगी ? इत्यादि सन्देह दिन में अन्धकार की नाई
शान्त हो जाते हैं, कारण कि इस ग्रन्थ के सुनने से दोनों मे (जन्म ओर कर्म में) अविद्यामूलक
मिथ्यात्व का निश्चय हो जाता हे रात्रि की नाई अविद्या के नष्ट होने एवं ज्ञानरूपी आलोक के
प्राप्त होने पर सदा सब पदार्थों मे शान्ति (रागद्वेष आदि से क्षोभ न होना) हो जाती है । इस
ग्रन्थ का विचार करनेवाले पुरुष के हृदय में समुद्र की सी गम्भीरता, मेरु पर्वत की सी निश्चलता
और चन्द्रमा की सी शीतलता प्राप्त होती