Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 20, Verses 1–2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 20, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
आर्यसंगमयुक्त्यादौ प्रज्ञां वृद्धिं नयेद्बलात् ।
ततो महापुरुषतां महापुरुषलक्षणैः ॥ १ ॥
यो यो येन गुणेनेह पुरुषः प्रविराजते ।
शिष्यते तं तमेवाशु तस्माद्बुद्धिं विवर्धयेत् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
उन्नीसर्वं सर्म समाप्त
बीसवाँ सर्ग
एक दूसरे को बढ़ानेवाले प्रज्ञाबुद्धि प्रकार, महापुरुषलक्षण और सदाचारक्रम का कथन ।
उक्त ज्ञान महापुरुषों में ही रहता है दूसरों में नहीं, और महापुरुष बनने में वक्ष्यमाण
सदाचार ही कारण है, अत: सदाचार का वर्णन करने के लिए उपक्रम कर रहे श्रीवसिष्ठजी
बोले ।
श्रीरामचन्द्रजी, पहले आर्यो के संसर्ग से प्राप्त उपदेश, आचरण, शिक्षण ओर युक्ति
द्वारा बुद्धि को बढाना चाहिए, तदनन्तर आगे कहे जानेवाले महापुरुष के लक्षणों से अपने में
महापुरुषता का सम्पादन करना चाहिए । यदि सम्पूर्ण गुण एक पुरूष में न मिलें, तो इस संसार
में जो पुरुष जिस गुण के द्वारा उन्नत प्रतीत होता है, वह उसी गुण के द्वारा दूसरे पुरुषों से
विशिष्ट गिना जाता है, अतः उस पुरुष से शीघ्र उस गुण को प्राप्त कर अपनी बुद्धि को बढाना
चाहिए