Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 3, Verses 11–13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 3, verses 11–13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 11-13
संस्कृत श्लोक
संकल्पनिर्माणमिव मनोराज्यविलासवत् ।
इन्द्रजालामाल इव कथार्थप्रतिभासवत् ॥ ११ ॥
दुर्वातभूकम्प इव त्रस्तबालपिशाचवत् ।
मुक्तालीवामले व्योम्नि नौस्पन्दतरुयानवत् ॥ १२ ॥
स्वप्नसंवित्तिषुरवत्स्मृतिजातखपुष्पवत् ।
जगत्संसरणं स्वान्तर्मृतोऽनुभवति स्वयम् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार जगत् के वासनामय होने पर जो फलित हुआ अर्थात् परमार्थ दृष्टि से उसमें
भ्रमरूपता प्राप्त हुई, उसका वर्णन करते हैं ।
यह जगत् संकल्प से निर्मित की नाई, मनोराज्य के विलास की नाई, इन्द्रजाल से रचित
माला की नाई, उपन्यास के अर्थ के प्रतिभास की नाई, वातरोग से प्रतीत होनेवाले भूकम्प की
नाई, बालक को डराने के लिए कल्पित भूत की नाई, निर्मल आकाश में कल्पित मुक्तावली
त] "यद् यद् भवन्ति तदाभवन्ति (व्याघ्र, सिंह आदि जो जो पहले हुए थे वे फिर आकर वे ही
होते हैं । करोड़ों युगो का व्यवधान पड़ने पर भी संसारी जीव की पहले भावित वासना नष्ट नहीं
होती) "यं यं स्मरन् भावम्" (जिस-जिस भाव का स्मरणकर अन्त में जीवन त्याग करता है उस-
उस भाव को प्राप्त होता है) इत्यादि श्रुति ओर स्मृतियाँ इस विषय में प्रमाण हैं ।
की (मोतीमाला की) नाई, नावकी गति से प्रतीत होनेवाली वृक्षों की गति की नाई, स्वप्न में
देखे गये नगर की नाई, अन्यत्र दृष्ट के स्मरण से आकाश में कल्पित पुष्प की नाई भ्रमकल्पित
हे । मृत पुरुष इसका अपने हृदय में स्वयं अनुभव करता हे