Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 3, Verses 15–16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 3, verses 15–16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 15,16
संस्कृत श्लोक
पुनस्तत्रैव जग्नेद्वामरणाद्यनुभूतिमान् ।
परं लोकं कल्पयति मृतस्तत्र तथा पुनः ॥ १५ ॥
तदन्तरन्ये पुरुषास्तेवामन्तस्तथेतरे ।
संसार इति भान्तीमे कदलीदलपीठवत् ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
यही इहलोक” कहलाता हे, यह अभिप्राय हे । अव्यवस्थितस्वभाव का होने के कारण भी
जगत् मिथ्या है, ऐसा दशनि के लिए कहते है ।
जन्म, जन्म से लेकर मरण तक की चेष्टाएँ और मरण का अनुभव करनेवाला जीव उसीमें
इहलोक की कल्पना करता है, जैसा कि ऊपर बतलाया गया हे ओर मरण के अनन्तर उसीमें
परलोक की कल्पना करता है । वासना के अन्दर अन्य अनेक देह और उनके मध्य में और
अन्यान्य देह इस संसार में, ये केले के तने त्वचा के समान एक के पीछे एक और एक के पीछे
एक इस प्रकार शोभित होते हैं