Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 4, Verses 18–19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 4, verses 18–19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 18,19
संस्कृत श्लोक
यत्नवद्भिर्दृढाभ्यासैः प्रज्ञोत्साहसमन्वितैः ।
मेरवोऽपि निगीर्यन्ते कैव प्राक्पौरुषे कथा ॥ १८ ॥
शास्त्रनियन्त्रितपौरुषपरमा पुरुषस्य पुरुषता या स्यात् ।
अभिमतफलभरसिद्ध्यै भवति हि सैवान्यथा त्वनर्थाय ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
आधुनिक अल्प पुरुषार्थ अनेक करोड़ कल्पो से उपार्जित अनन्त प्राक्तन कर्मो पर विजय
कैसे प्राप्त करता है ? इस पर कहते हैं।
निरन्तर प्रयत्न करनेवाले, दृढ अभ्यासवाले एवं प्रज्ञा और उत्साह से युक्त पुरूष प्रलय में
अधिकार रखनेवाले देवताओं की पदवी को प्राप्त होकर महान् मेरू पर्वत तक को निगल जाते
हैं, मटियामेट कर डालते हैं, प्राक्तन (पूर्व जन्म के) पौरुष की तो बात ही क्या है ? भाव यह
कि यद्यपि प्राक्तन कर्म अनन्त हैं, फिर भी उनका मूल एक ही है उनके मूल का नाश करने से
उन पर बड़ी आसानी से विजय प्राप्त की जा सकती है। श्रुति आदि से नियन्त्रित (श्रुत्यनुसारी)
पुरुषार्थ का ही अवश्य सम्पादन करनेवाली पुरुषकी जो निरन्तर उद्योगशीलता है, वही अभीष्ट
सिद्धि देनेवाली होती है । शास्त्रविधि के प्रतिकूल पुरुषार्थ का उपार्जन करनेवाली पुरुष की
उद्योगशीलता अनर्थकारिणी होती है