Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 4, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 4, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
तस्मात्प्रकृतमेवेदं शृणु श्रवणभूषणम् ।
मयोपदिश्यमानं त्वं ज्ञानमज्ञान्ध्यनाशनम् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे रामचन्द्र, आप सर्वत्र तत्-तत् द्रष्टान्तों के स्मरण का विवक्षित सारभूत अंश वस्तु की
स्वरूप से अप्रच्युति हैं, ऐसा जानो, अविवक्षित कार्यभेदकृत विलक्षणता की कल्पना मत
करो ओर कानों को अति प्रिय लगनेवाले, अज्ञानरूपी अन्धकार का विनाश करनेवाले, जिस
उत्तम ज्ञान का मैं उपदेश दे रहा हूँ, उक्त प्रस्तुत ज्ञान को ही तुम सुनो