Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 5, Verses 25–27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 5, verses 25–27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 25-27
संस्कृत श्लोक
स च सच्छास्त्रसत्सङ्गसदाचारैर्निजं फलम् ।
ददातीति स्वभावोऽयमन्यथा नार्थसिद्धये ॥ २५ ॥
स्वरूपं पौरुषस्यैतदेवं व्यवहरन्नरः ।
याति निष्फलयत्नत्वं न कदाचन कश्चन ॥ २६ ॥
दैन्यदारिद्र्यदुःखार्ता अप्यन्ये पुरुषोत्तमाः ।
पौरुषेणैव यत्नेन याता देवेन्द्रतुल्यताम् ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
क्योंकि प्रत्यक्षावगमं धर्म्य सुसुखं कर्तुमव्ययम्“ (अनेक जन्मो से संचित निष्काम कर्म
का फल गुरु द्वारा प्रदर्शित विचार से युक्त वेदान्तवाक्य से युखमूर्वक प्राप्त किया जा सकता
है) ऐसी स्मृति है ।
यदि शंका हो कि उक्त प्रत्यक्षावगमम् इत्यादि वाक्य पूणहित्या सवान् कामानवाप्नोति”
(पूर्णाहृति से सम्पूर्ण कामो को प्राप्त करता है) इसके समान प्ररोचनामात्र है, क्योकि
अधिक श्रम होने पर ही अधिक फल प्राप्त होता है, ऐसा नियम है, तो उक्त नियम पर
अन्वयव्यभिचार दशति हैं ।
बड़े भारी प्रयत्न से भी पत्थर से रत्न नहीं प्राप्त हो सकता और रत्न की परीक्षा में निपुण
व्यक्तियों को परिश्रम के बिना भी प्रचुर लाभ होता दिखाई देता है । इस प्रकार व्यतिरेक
व्यभिचार भी समझना चाहिए । जैसे जल से घडा परिमित है एवं जैसे लम्बाई चौड़ाई आदि
परिमाण से वस्त्र परिमित है, वैसे ही पुरुषप्रयत्न भी परिमाणस्थ (आत्मतत्त्वसाक्षात्काररूपी
फल की अवधि में स्थित) एवं परिमित है, अर्थात् उसकी अवधि (सीमा) तत्त्वसाक्षात्कार है ।
उक्त पुरुषप्रयत्न यदि सत् शास्त्र, सत्संग ओर सदाचार से युक्त होता है, तो अपना फल
(तत्त्वसाक्षात्कार) देता है, यह उसका स्वभाव है । यदि वह सत्शास्त्र, सत्संग ओर सदाचार
से रहित होता है, तो उससे फल की सिद्धि नहीं होती । पौरुष का यह स्वरूप है, इस प्रकार
व्यवहार कर रहे किसी भी पुरुष का प्रयत्न भी विफल नहीं होता दीनता और दरिद्रता से
उत्पन्न दुःख से पीडित हुए नल, हरिश्चन्द्र आदि श्रेष्ठ पुरुष भी अपने पुरुषप्रयत्न से ही
देवराज के सदृश हो गये हें