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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 6, Verses 40–43

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 6, verses 40–43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 40-43

संस्कृत श्लोक

शास्त्रैः सदाचरविजृम्भितदेशधर्मैर्यत्कल्पितं फलमतीव चिरप्ररूढम् । तस्मिन्हृदि स्फुरति चोपनमेति चित्तमङ्गावली तदनु पौरुषमेतदाहुः ॥ ४० ॥ बुद्ध्वैव पौरुषफलं पुरुषत्वमेतदात्मप्रयत्नपरतैव सदैव कार्या । नेया ततः सफलतां परमामथासौ सच्छास्त्रसाधुजनपण्डितसेवनेन ॥ ४१ ॥ दैवपौरुषविचारचारुभिश्चेदमाचरितमात्मपौरुषम् । नित्यमेव जयतीति भावितैः कार्य आर्यजनसेवयोद्यमः ॥ ४२ ॥ जन्मप्रबन्धमयमामयमेष जीवो बुद्ध्वैहिकं सहजपौरुषमेव सिद्ध्यै । शान्तिं नयत्ववितथेन वरौषधेन मृष्टेन तुष्टपरपण्डितसेवनेन ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

समर्थित जो चित्तशुद्धिरूप और ज्ञानरूप अति प्रसिद्ध फल है, उसकी हृदय में अति उत्कट अभिलाषा होने पर उसको प्राप्त करने की इच्छा से चित्त में क्रिया होती है, उसके अनन्तर इन्द्रिय, हाथ, पैर आदि में क्रिया होती है, तब पुरुष श्रवण, मनन आदि करता है, इसीको पौरुष कहते हैं । अधिकारी पुरुषका जन्म पुरुषार्थकी सिद्धि होने पर ही सफल होता है, अन्यथा नहीं, यह जानकर सदा आत्मप्रयत्न में संलग्न रहना चाहिए । तदुपरान्त इस प्रयत्नपरायणता को सत्शास्त्रों के अभ्यास, सन्त महात्माओं ओर विद्वानों की सेवा द्वारा आत्मज्ञानरूप फल प्राप्ति से सफल बनाना चाहिए | यदि पौरुष का अवलम्बन किया जाय, तो वह अवश्य दैव को जीत लेता है, इस प्रकार दैव और पौरूष के बलाबल के विचार से भव्य, शम, दम आदि साधनों से सम्पन्न एवं श्रेष्ठ पुरुषों की सेवा में नित्य संलग्न अधिकारी पुरूषों को श्रवण, मनन आदि द्वारा तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति के लिए उद्यम करना चाहिए। यह अधिकारी जीव को इस जन्म में सम्पादन करने योग्य सहज पौरुष ही परम पुरुषार्थलाभ का हेतु है, ऐसा निश्चय कर सदा आनन्दमग्न सर्वोत्कृष्ट ब्रह्मवेत्ताओं की शुश्रूषारूप अमोघ मधुर उत्तम औषधि से विविध जन्ममरणपरम्परारूप भवरोग को शान्त करें