Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 9, Verse 32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण, सर्ग 9, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
अशुभाच्चालितं याति शुभं तस्मादपीतरत् ।
जन्तोश्चित्तं तु शुवित्तन्मुहूश्चतूयेद्गलात् ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
चित्तरूपी नदी दो प्रकार से बहती है पाप के लिए और पुण्य के लिए उन दो ग्रोतों में से एक
का निरोध होने पर दूसरे ग्रोत में चित्तनदी दुगुने प्रवाह से बहती है, यह बात योगशास्त्र के
अनुसार कहते हैं।
अशुभ कर्म से (पापमार्ग से) निवारित मनुष्य का चित्त बालक की नाई शुभ कर्म में (पुण्यमार्ग
में) जाता है और पुण्यमार्ग से निवारित पापमार्ग में जाता है, इसलिए प्रयत्न के साथ पापमार्ग
से चित्त को हटाना चाहिए