Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 1, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
वाग्भाभिर्ब्रह्मविद्ब्रह्म भाति स्वप्न इवात्मनि ।
यदिदंतत्स्वशब्दोत्थैर्यो यद्वेत्ति स वेत्ति तत् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
उत्पत्ति प्रकरण
पहला सर्ग
केवल ज्ञान से ही आत्मा की मुक्ति होती है, कर्म और समाधि से नहीं |
अज्ञात आत्मा ही स्वयं दृश्य की सृष्टि करता है इत्यादि का प्रतिपादन ।
मुमुश्चुव्यवहारप्रकरण के अनन्तर पूर्वोक्त साधनों से सम्पन्न अधिकारी के लिए तावद्
विचारयेत् प्राज्ञो यावद् विश्रान्तिमात्मनि । संप्रयात्यपुनर्नाशां शान्तिं तुर्यपदामिघाम् ॥*
(बुद्धिमान पुरूष को तब तक विचार करना चाहिए जव तक कभी नष्ट न होनेवाली
सप्तमभरूमिकाप्राप्तिरूप तथा आत्मा मे विश्रान्तिरूप शान्ति नहीं प्राप्त होती ।) इस प्रकार
तत्त्वके साक्षात्कारपर्यन्त विचारका कर्तव्यरूप से विधान किया है । वैराग्यप्रकरण तथा
मुमुक्ष॒व्यवहारप्रकरणमें वर्णित सम्पूर्ण साधनो से सम्पन्न सर्वोत्तम अधिकारी श्रीरामचन्द्रजीके
लिए उक्त विचार के प्रकार का अथोपदिश्यते सम्यगेवं ज्ञानक्रमोऽधुना ।* यों प्रतिज्ञापूर्वक
विस्तार से वर्णन करने के लिए प्रवृत्त हुए भगवान् श्रीवस्निष्ठजी सृष्टिप्रकार के वर्णन द्वारा
अद्वैत ब्रह्म का प्रतिपादन करने के लिए आरब्ध (आरंभ किये गये) उत्पत्तिप्रकरणका, सुखपूर्वक
बोध के लिए, पहले संक्षेपमें तात्पर्य दशनि की इच्छासे जैसे तद्वेदं तह्म॑व्याकृतमासीत् इत्यादि
सृष्टिप्रतिपादक श्रुतिका “अहं ब्रह्मास्मि“ इत्यादि महावाक्यके बोधमें पर्यवसान है वैसे ही इस
प्रकरणका भी दष्टान्तस्यैकदेशेन बोध्यबोधोदये सति । उपादेयतया ग्राह्यो
महावाक्यर्थनिर्णयः ॥' पूर्वोक्त रीति से महावाक्य के बोधमें पर्यवसरान दिखलाते हैं -
ब्रह्म ही जब “अहं ब्रह्मास्मि" इत्यादि महावाक्य से उत्पन्न अखण्डाकार वृत्ति से अत्यन्त
प्रदीप्त आत्मप्रकाश द्वारा स्वतत्त्व का साक्षात्कार कर लेता है, तब वह अपने वास्तविक नित्य,
मुक्त ओर पूर्णस्वरूप से प्रकाशित होता हे ।
भाव यह कि वह अपनी मुक्ति के लिए “अहं ब्रह्मास्मि“ आदि महावाक्य से जन्य
अखण्डाकार वृत्ति से अतिरिक्त किसी साधन की अपेक्षा नहीं करता ।
शंका - सो कैसे 7
समाधान - चूंकि स्वप्न में विविध विचित्र पदार्थो की नाई यह देह, इन्द्रिय आदि तथा
आकाश आदि बन्धरूप दृश्य प्रत्यगात्मभूत ब्रह्म में ही आविर्भूत होकर प्रकाशित होता है । जैसे
स्वप्न बन्ध की निवृत्ति के लिए प्रबोध से अतिरिक्त साधन की अपेक्षा नहीं होती है वैसे ही
आत्मतत्त्व के साक्षात्कार के लिए महावाक्यजन्य अखण्डाकार वृत्ति से अतिरिक्त साधन की
अपेक्षा नहीं होती, यह भाव है। श्रुति भी है यद्ब्रह्मविद्यया सर्व भविष्यन्तो मनुष्या मन्यन्ते किमु
तद्ब्रह्मावेद् यस्मात्तत्सर्वमभवत् (ब्रह्मविद्या से ब्रह्म श्रीपरमात्मा) जिससे ज्ञात होता है वह
ब्रह्मविद्या है उससे हम सब' हो जायेंगे, ऐसा मनुष्य मानते हैं, ब्रह्म ने क्या जाना जिससे कि
वह सर्वहुआ) ऐसा प्रश्न कर उत्तर दिया है ब्रह्म वा इृदमग्रआसीत् तदात्मानमेवावेदहमस्मीति
तस्मात्तत्वसर्वमभवत्” (यह ब्रह्म ही सृष्टि के पूर्व था, उसने “अहं ब्रह्मास्मि“ यो अपने को
जाना उससे वह सर्व हो गया) इस श्रुति में ब्रह्म स्वयं स्वतत्त्व के बोध से बन्धनशून्य ओर पूर्ण
हो गया इस कथन से ब्रह्म ही स्वतत््वबोध से पहले द्वैत, प्रिय-अप्रिय दर्शन परिच्छेदरूप बन्ध
का अनुभव-सा करता है । इससे बन्ध का मिथ्यात्व प्रत्यग् आत्मा का ब्रह्मत्व अतिस्पष्टरूप
से ज्ञात होता है। जैसे वहाँ पर महावाक्य के अर्थ के उपपादक (तन्नमरूपाभ्यामेव व्याक्रियत“
(वह अव्याकृत आत्मा नाम और रूप से व्याकृत हुआ अर्थात् ऐसे व्यक्तिभाव को प्राप्त हुआ
जिसमें नाम-रूप विशेष के निश्चय की मर्यादा है), “स एष इह प्रविष्ट आनखोभ्य:” (आत्मा
देह में नखाग्रपर्यन्त व्याप्त है) इत्यादि पूर्ववर्ती सृष्टि और प्रवेश के प्रतिपादक अर्थवादभ्रूत
वाक्यो का -अज्ञातब्रह्ममात्रोपादानक (केवल अज्ञात ब्रह्म ही जिनका उपादान है) जगत् और
जीवकी उत्पत्ति, स्थिति और विनाश इन तीनों कालो में ब्रह्म से अतिरिक्त सत्ता नहीं है, अतः
वे मिथ्या ही हैं- यों उपपादन द्वारा अपने प्रधानभूत महावाक्य के तात्पर्य के विषय अद्वैत ब्रह्म
में पर्यवसान है वैसे ही यहाँ पर भी समझना चाहिये, यह भाव है।
शंका - वैसा हो उससे हमें क्या प्रयोजन है ?
समाधान - "तद्" इत्यादि से । “उस ब्रह्म को इस समय का जो हमारे समान अधिकारी
श्रवण आदि उपायों से जिस प्रकार यथार्थरूप से “में ही ब्रह्म हूँ” यों साक्षात्कार करता है,
वह पूर्वोक्त पूर्ण, नित्य, मुक्त, ब्रह्मज्योतिस्वरूप मोक्षफल का भी जीतेजी अनुभव करता
है। श्रुति भी है - तद् यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत्तद्यथर्षीणां तथा मनुष्याणां
तद्धैतत्पश्यन् ऋषिरवामदेव: प्रतिपेदेऽहं मनुरभवं सूर्यश्च" (देवता, ऋषि और मनुष्यों में
जिस जिसने यथोक्त विधि से आत्मा का यथार्थ ज्ञान प्राप्त किया वही आत्मा (ब्रह्म) हो
गया । ब्रह्म ही मैं हूँ” यों साक्षात्कार कर रहे ऋषि वामदेवजी को यह ज्ञान हुआ कि 'मैं मनु
हुआ और मैं सूर्य हुआ (=>)