Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 1, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
नेदं नेदमिति व्यर्थप्रलापैर्नोपशाम्यति ।
संकल्पजनकैर्दृश्यव्याधिः प्रत्युत वर्धते ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
कोड शंका करे कि यदि दृश्य का अभाव ही मोक्ष है, तो तत्-तत् काल में उपस्थित हुए
दृश्य के यह नहीं है, यह नहीं है“ इत्यादि निराकरण से ही रोग के निराकरण से आरोग्य की
नाई मोक्ष सिद्ध हो जायेगा, उसके निराकरणार्थ तत्त्वज्ञानप्राप्ति के लिए कष्ट उठाने की क्या
आवश्यकता है ? इस पर कहते हैं।
यह (दृश्य) नहीं है, यह (दृश्य) नहीं है इत्यादि व्यर्थ प्रलापों से इसका विनाश नहीं
होता बल्कि संकल्प के हेतु “यह दृश्य नहीं है” इत्यादि प्रलापों से दृश्यरूप व्याधि बढ़ती हे ।
भाव यह है कि दृश्य रहते “यह दृश्य नहीं है” यह प्रलाप बाधित हो जाता है, अतः वह
विद्यमान दृश्य के विरोधी अन्य दृश्य के उत्पादन-संकल्प से उसके उत्पादन द्वारा पूर्व दृश्य
का निराकरण करता है, ऐसा कहना होगा, ऐसी परिस्थिति में एक दृश्य के निराकरण के
लिए दो दृश्यों की उत्पत्ति हो जाने से दृश्य बढ़ता ही है