Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, Verse 40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 1, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
न च पाषाणतातुल्या रूढिं याताः समाधयः ।
भवन्त्यग्रपदं शान्तं चिद्रूपमजमक्षयम् ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि जिनकी समाधि रूढ (परिपक्र) नहीं हुई हो, उन्हें भले ही स्थिरता
प्राप्त न हो, किन्तु जिनकी समाधि परमात्मभावापत्तिपर्यन्त रूढ है, उन्हें तो स्थिरता प्राप्त
होगी, इस पर कहते हैं।
परिपक्वता को प्राप्त होने पर भी पाषाणता के तुल्य अचेतन समाधियाँ शान्त, चिद्रूप,
अज तथा अक्षयरूप नहीं हो सकती यानी उक्त पाषाणतुल्य समाधिर्यो सम्पूर्णं संसार की
निःशेष शान्तिरूप मोक्ष नहीं हो सकती