Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 10, Verses 51–53
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 10, verses 51–53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 51-53
संस्कृत श्लोक
वेद्यवेदनवेत्तृत्वं यत्रेदं प्रतिबिम्बति ।
अबुद्ध्यादौ महादर्शे तद्रूपं परमं स्मृतम् ॥ ५१ ॥
मनः स्वप्नेन्द्रियैर्मुक्तं यद्रूपं स्यान्महाचितेः ।
जङ्गमे स्थावरे वापि तत्सर्वान्तेऽवशिष्यते ॥ ५२ ॥
स्थावराणां हि यद्रूपं तच्चेद्बोधमयं भवेत् ।
मनोबुद्ध्यादिनिर्मुक्तं तत्परेणोपमीयते ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
उसमें जो निमित्तकारणता है, वह परिणामरूप से नहीं है, किन्तु विवर्तरूप से है, ऐसा
कहते हैं।
४ तैतिरीय उपनिषद् में-अन्नमय आदि सब कोषों के आन्तर आनन्दमय कोष को दिखलाकर
"तस्य प्रियमेव शिरः । मोदः दक्षिणः पक्षः । प्रमोद उत्तरः पक्षः । आनन्द आत्मा ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा |
इस श्रुति द्वारा आनन्दमय कोष का भी आन्तर ब्रह्म दर्शाया गया है ।
() बृहदारण्यक उपनिषत् में - दरे वाव ब्रह्मणो रूपे मूर्तं चैवामूर्तं च" इस प्रकार आरम्भ कर "तस्यैतस्य
मूर्तस्य रसो य एष तपति तस्यैतस्यामूर्तस्य रसो य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषः, इससे मूर्त ओर अमूर्त
रूप का सार दिखला कर "अर्थात् आदेशो नेति नेति“ इससे मूर्त ओर अमूर्त के आरोप का अधिष्ठान
ब्रह्म उनका आन्तर है, यह बात उनके (मूर्त ओर अमूर्तके) निषेध से दिखलाई है ।*
&. तलवकारोपनिषत् में- “प्रतिबोधविदितं मतम्“ इस वाक्य से ब्रह्म सम्पूर्ण बुद्धिवृत्तियौका आन्तर
कहाया है ।
बुद्धि आदि से रहित महादर्पण रूप जिसमें ज्ञेय, ज्ञान, ज्ञाता रूप जगत् प्रतिबिम्बित होता
है, वही उसका सर्वश्रेष्ठ परम रूप हे । स्वप्न ओर जागरण से निर्मुक्त सुषुप्तरूप जो मन है,
वही महाचित् का रूप है, वही दृश्य का प्रलय होने पर स्थावर और जंगम पदार्थो में अवशिष्ट
रहता है। स्थावर पदार्थो का मन, बुद्धि आदि से शून्य जो रूप है यानी अचलस्वभाव, वह यदि
बोधमय (चेतनायुक्त) हो जाय, तो उनके मन, बुद्धि आदि से निर्मुक्त उस बोधरूप की
परमात्मा से तुलना की जा सकती है