Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 100, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 100 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
प्रबुद्धानां मनो राम ब्रह्मैवेह हि नेतरत् ।
जलसामान्यबुद्धीनामब्धेर्नान्यस्तरङ्गकः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे तरंगसत्ता
जलकी सत्ता से अतिरिक्त नहीं है ऐसा समझनेवाले पुरुषों की दृष्टि में तरंग समुद्र से भिन्न
नहीं है, वैसे ही इस लोकमें ज्ञानी (चित्त की सत्ता ब्रह्मकी सत्ता से भिन्न नहीं है, यह जाननेवाले)
पुरुषों का चित्त ब्रह्म ही है, उससे भिन्न नहीं है