Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 100, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 100 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
स्वयमक्षुब्धविमले यथा स्पन्दो महाम्भसि ।
संसारकारणं जीवस्तथायं परमात्मनि ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे निश्चल और
निर्मल जलराशिमें अपने-आप स्पन्द (कम्पन) होता है वैसे ही परमात्मा में यह जीव भी
उत्पन्न हुआ है, यही संसार का कारण है, भाव यह है कि जगत्की कल्पना करनेवाला जीव
ही जब ब्रह्म से भिन्न नहीं है तब उससे कल्पित जगत् ब्रह्म से भिन्न कैसे होगा ?