Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, Verses 32–33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 100, verses 32–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 100 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
आत्मैवेदं जगत्सर्वमात्मैव कलनाक्रमः ।
हेमाङ्गदतयेवायमात्मोदेति मनस्तया ॥ ३२ ॥
अबुद्धं यत्परं धाम तच्चित्तं जीव उच्यते ।
अपरिज्ञात एवाशु बन्धुरायात्यबन्धुताम् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
यह सारा जगत् आत्मा ही है । जो कुछ यह कल्पनाक्रम है, वह सब आत्मा ही
है, बहुत क्या कहें, जैसे सुवर्ण अंगद (बाजूबन्द) रूपसे उदित होता है, वैसे ही आत्मा
मनरूपसे उदित हुआ है