Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 100, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 100 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
नित्यासंभवबन्धस्य बद्धोऽस्मीति कुकल्पना ।
यस्य काल्पनिकस्तस्य मोक्षो मिथ्या न तत्त्वतः ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
जिसका बन्धन
होना कभी सम्भव नहीं हे, उसकी “में वद्ध हूँ” यह कुकल्पना नहीं हे तो ओर क्या है जिसका
बन्ध काल्पनिक है, उसका मोक्ष भी मिथ्या ही है, वास्तविक नहीं हे, तब मोक्ष कैसा ? भाव
यह कि परमार्थदष्टिसे कल्पनाप्रसूत बन्ध और मोक्ष दोनों तुच्छ हैं