Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 100, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 100 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
अप्रबुद्धदृशां पक्षे तत्प्रबोधाय केवलम् ।
वाच्यवाचकसंबन्धकृतो भेदः प्रकल्प्यते ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
उपदेश्य, उपदेशक, शब्द, अर्थ आदि शास्त्रीय व्यवहारकी कल्पना भी अज्ञानियों का
अवलम्बन करके ही है, तत्त्वद्रष्टि से नहीं है, ऐसा कहते है ।
अज्ञानियों के पक्ष में केवल उनके उपदेश के लिए वाच्य-वाचक सम्बन्ध से उत्पन्न भेद
की कल्पना की जाती है