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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 101, Verses 25–28

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 101, verses 25–28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 101 · श्लोक 25-28

संस्कृत श्लोक

द्रोणैर्नवनवत्या तैस्तस्यां द्रोणेन चान्धसः । तत्र द्रोणशतं हीनं रन्धितं बहुभोजिभिः ॥ २५ ॥ निमन्त्रितास्त्रयस्तैस्तु ब्राह्मणा राजसूनुभिः । द्वौ निर्देहावथैकस्य मुखमेव न विद्यते ॥ २६ ॥ निर्मुखेनान्धसस्तत्र भुक्तं द्रोणशतं सुत । विप्रभुक्तावशेषं तु भुक्तमन्धो नृपात्मजैः ॥ २७ ॥ त्रिभिस्ते राजपुत्राश्च परां निर्वृतिमागताः । भविष्यन्नगरे तस्मिन् राजपुत्रास्त्रयो हि ते । सुखमद्य स्थिताः पुत्र मृगयाव्यवहारिणः ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

बहुत-सा भोजन करनेवाले उन राजकुमारों ने उस बटलोही में निनानवे ओर एक कम सौ द्रोण (एक द्रोण = १५ कि.ग्रा.) चावल पकाये | उक्त राजकुमारों ने तीन ब्राह्मणों को भोजन करने के लिए निमन्त्रण दिया | उनमें से दो तो देहरहित थे और एक का मुँह ही न था। वत्स, जिसका मुँह न था, उसने सौ द्रोण अन्न खा डाला । ब्राह्मण के भोजन करने से जो अन्न बच गया था, वह उन तीनों राजकुमारोने खाया । उसे खाकर उन राजकुमारों को बड़ी तृप्ति हुई हे पुत्र, उस भावी नगर में वे तीन राजकुमार सुख शान्ति से स्थित हैं और मृगया से क्रीड़ा करते हैं यानी शिकार खेलते हैँ