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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 102, Verse 30

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 102, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 102 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

असदेवेदमारम्भमन्थरं सदिवोत्थितम् । \\xa0कल्पितं जगदाभोगि दीर्घस्वप्न इवैतया ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

इस मानसी शक्ति ने ही इस विशाल जगत्‌ को दीर्घकालीन स्वप्न के तुल्य असत्‌ होते हुए भी विविध व्यापारो से पूर्ण सत्‌ के समान उदित बनाया है