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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 103, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 103, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 103 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

लब्धप्रतिष्ठं परमात्पदादुल्लसितं मनः । निमेषेणैव संसारान्करोति न करोति च ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

मन को ऐसी सामर्थ्य कहाँ से प्राप्त हो गई, ऐसी शंका होने पर कहते हैं। उल्लसित मन परमपदरूप ब्रह्म की सत्ता से सत्ता को प्राप्त हुआ है, यह पलक भर में विविध संसारों की रचना कर देता है और पलक भर में उन्हें मटियामेट कर डालता है