Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 104, Verses 15–17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 104, verses 15–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 104 · श्लोक 15-17
संस्कृत श्लोक
यस्योदारसमारम्भमार्यलोकानुपालनम् ।
चरितं संस्मरिष्यन्ति हरेरिव चिरं जनाः ॥ १५ ॥
यस्याप्सरोमिरद्रीन्द्रमूर्धस्वमरसद्मसु ।
विकासिपुलकोल्लासं गीयन्ते गुणगीतयः ॥ १६ ॥
यस्य स्वःसुन्दरीगीता लोकपालचिरश्रुताः ।
विरिञ्चिहंसैर्ध्वन्यन्ते स्वभ्यासाद्गुणगीतयः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
धार्मिक पुरुषों के रक्षक उदार कर्मो से भरे
हुए जिसके चरित का श्री हरि के चरित की नाई चिरकाल तक लोग स्मरण करेगे । जिस राजा
के गुणों के गीतों को अप्सराएँ पर्वतराज हिमालय के शिखरो पर स्थित देवमन्दिरों में प्रचुर
रोमांचों से युक्त होकर आज भी गाती है जिसके गुणों के गीतों का जिन्हे स्वर्गीय सुन्दरियों ने
गाया था ओर लोकपालों ने चिरकाल तक सुना था, ब्रह्मा के हंस सुन्दर अभ्यास से अपनी
ध्वनियो द्वारा अनुकरण करते हैं