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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 104, Verse 38

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 104, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 104 · श्लोक 38

संस्कृत श्लोक

इत्युक्तवति तस्मिंस्तु प्रत्युवाचैन्द्रजालिकः । जलदस्तनिते शान्ते चातकोऽम्बुधरं यथा ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे मेघनिर्घोष के शान्त होने पर चातक मेच से कहते हैं वैसे ही उसके ऐसा कहने पर एेन्द्रजालिक ने कहा