Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 105, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 105, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 105 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
आपातरमणीयेषु पर्यन्तविरसेषु च ।
भोगेष्विव विकल्पेषु केषु ते लुलितं मनः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
आपातरमणीय ओर परिणाम में विरस भोगो में
जैसे पामर जनोंका मन ललचाता है वैसे ही किन विकल्पों में आपका मन मोह को प्राप्त
हुआ