Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, Verses 15–18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 106, verses 15–18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 106 · श्लोक 15-18
संस्कृत श्लोक
तदरण्यं मयातीतमतिकृच्छ्रेण खेदिना ।
विवेकिनेव संसारो मध्यशून्यतताकृति ॥ १५ ॥
यदेतेनातिवाह्याहं प्राप्तवाञ्जङ्गलं क्रमात् ।
अस्ताद्रिसानुं खिन्नाश्वः शून्यभ्रान्त्येवभास्करः ॥ १६ ॥
जम्बूकदम्बप्रायेषु कलालापाः पतत्रिणः ।
यत्र स्फुरन्ति खण्डेषु पान्थानामिव बान्धवाः ॥ १७ ॥
यत्र शष्पशिखाश्रेण्यो दृश्यन्ते विरलाः स्थले ।
कदर्थलक्ष्म्या जिह्मस्य हृदीवानन्दवृत्तयः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे विवेकी पुरुष संसार का अतिक्रमण करता हे, वैसे ही दुःखी
हुए मैंने मध्य-रहित ओर विस्तीर्ण उस अरण्य को किसी प्रकार बड़े क्लेश से लाँघा, जैसे सूर्य
जिनके घोड़े श्रान्त हो गये हों, आकाशगमन से अस्ताचल के शिर को प्राप्त होते है वैसे ही इस
वेगशाली घोड़े से उस जंगल को क्रमशः लाँघकर वहाँ पर प्राप्त हुआ, जामुन ओर कदम्ब ही
जिनमें प्रचुरमात्रा में थे एेसे जिन खण्डं में बटोहियों के बान्धवो की नाई मधुर कलरव
करनेवाले पक्षी उड रहे थे ऐसे खेतों में कहीं-कहीं धानों की बात ऐसे ही दृष्टिगोचर हो रही थी
जैसे कि कुटिल पुरूष के हृदय में अधर्म से उपार्जित धन से आनन्द वृत्तियाँ उदित होती
हँ