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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, Verses 20–23

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 106, verses 20–23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 106 · श्लोक 20-23

संस्कृत श्लोक

तत्र जम्बीरखण्डस्य तलं संप्राप्तवानहम् । मार्कण्डेय इवागेन्द्रमेकार्णवविहारतः ॥ २० ॥ आलम्बिता मया तत्र स्कन्धसंसर्गिणी लता । नीला जलदमालेव तापतप्तेन भूभृता ॥ २१ ॥ मयि प्रलम्बमानेऽस्यां प्रयातः स तुरङ्गमः । गङ्गावलम्बिनि नरे यथा दुष्कृतसंचयः ॥ २२ ॥ चिरं दीर्घाध्वगः खिन्नस्तत्र विश्रान्तवानहम् । भानुरस्ताचलोत्सङ्गे तले कल्पतरोरिव ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे एकमात्र समुद्र में विहार करने के बाद मार्कण्डेयजी श्री विष्णु भगवान्‌ से अधिष्ठित श्रेष्ठ वटवृक्ष को प्राप्त हुए थे, वैसे ही मैं भी वहाँ पर जंभीर के पेड के नीचे पहुँचा । जैसे सूर्य के सन्ताप से सन्तप्त पर्वत नीली मेघघटा का अवलम्बन करता हे वैसे ही वहाँ पर उस वृक्ष के तने से सटी हुई लता का घोडे के त्याग के लिए मैंने अवलम्बन किया । जैसे मनुष्य के गंगाजी की शरण लेने से पाप राशि भाग जाती है वैसे ही मेरे उस लता के सहारे लटकने पर वह घोडा भाग गया । मेँ दीर्घकाल का पथिक था, अतः थक कर चूर हो गया था । वहाँ पर मैंने चिरकाल तक ऐसे विश्राम लिया जैसे सूर्य अस्ताचल पर्वत की गोद मेँ कल्पवृक्ष के नीचे विश्राम करते हैं