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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, Verse 30

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 106, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 106 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

विनिद्रस्य विधैर्यस्य स्फुरतः सह पल्लवैः । समं दुष्टातिदैर्घ्येण सा व्यतीयाय शर्वरी ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

उस भीषण रात्रि में नींद का तो मुझसे स्पर्श भी नहीं हुआ, धैर्य भी मेरा न मालुम कहाँ चला गया था, मैं पल्लवो के साथ कोप रहा था ऐसी शोचनीय अवस्थावाले मेरी वह रात्रि दुस्तर अति लम्बाई के साथ किसी प्रकार तो बीती