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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, Verses 55–56

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 106, verses 55–56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 106 · श्लोक 55,56

संस्कृत श्लोक

मां तत्रार्कमिवापूर्य सा प्रावृट् श्यामला गता । हस्तेन समुपादाय प्राणं बहिरिव स्थितम् ॥ ५५ ॥ दुराकृतिं दुरारम्भमाससाद भयप्रदम् । पितरं पीवराकारमवीचिमिव यातना ॥ ५६ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे मेघो से काली वर्षाऋतु सूर्य को छिपा देती हे वेसे ही वह श्यामल कामिनी मुझे वहाँ पर छिपाकर बाहर स्थित प्राण के समान हाथ से लेकर कुत्सित काली आकृतिवाले दुष्कर्मकारी अतिस्थूल तथा भयानक पिता के पास जैसे नारकीय व्यथा अवीचिनामक नरक में पहुँचती हे वैसे ही पर्हवी