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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 107, Verses 24–25

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 107, verses 24–25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 107 · श्लोक 24,25

संस्कृत श्लोक

अविकीर्णमसत्कीर्णं चण्डालारामभूमिषु । दृष्टः कुद्दालको दृष्ट्या संध्यास्नेहविमुक्तया ॥ २४ ॥ रौरवापतितेनेव तत्कालस्निग्धतां गतः । विन्ध्यकन्दरगुल्मानां बन्धुत्वमिव गच्छता ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

बेचने से बचे हुए मांस को चण्डालो के घरों के आस-पास के बागों में सूखने के लिए मैंने फैला दिया । वह अपवित्र मल, मूत्र आदि से व्याप्त था । रोरव नरक में पड़े हुए की तरह अत्यन्त दुर्दशा को प्राप्त हुए अतएव विन्ध्याचल की झाड़ियों के बन्धु से बन रहे मैंने सन्ध्या के ऊपर स्नेह से रहित यानी कन्द, मूल, मांस आदि के अर्जन में विघ्न डालनेवाले सन्ध्याकाल की विद्रेषिणी बुद्धि से कुदाली को ही देखा अन्य किसी को नहीं देखा, जो पोषक होने के कारण उस समय मित्रता को प्राप्त हुई थी