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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 108, Verses 10–11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 108, verses 10–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 108 · श्लोक 10,11

संस्कृत श्लोक

न वर्षति घनव्राते दृष्टनष्टे क्वचित्स्थिते । पूतांगारकणोन्मिश्रगतौ वहति मारुते ॥ १० ॥ शीर्णमर्मरपर्णासु दावाग्निवलितासु च । वनस्थलीषु शून्यासु चिरप्रव्रजितास्विव ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

मेघ समुह बरसते न थे, देखते ही नष्ट हो जाते थे। यह भी मालूम नहीं, वे कहाँ रहते थे, कपड़े से छने हुए से अत्यन्त सूक्ष्म अंगार-कणों से मिश्रित वायु बहती थी। वनस्थलियाँ शून्य थी, सूखे हुए मर्मरशब्द करनेवाले पत्तों से वे युक्त थी और चारों ओर वनाग्नि से परिवेष्टित थी, अतएव मालूम पड़ता था मानों बहुत दिनों से उन्होंने संन्यास ले रक्खा हो