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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 108, Verses 21–22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 108, verses 21–22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 108 · श्लोक 21,22

संस्कृत श्लोक

निष्पत्रपादपोड्डीनप्रौढाङ्गारमयानिलम् । रक्तपानोत्कमार्जारलीढधातुतटावनि ॥ २१ ॥ ज्वालाघनघटाटोपसावर्तसवनानिलम् । सर्वस्थलरसद्वह्निपुञ्जपिञ्जरजङ्गलम् ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

के घन घटाटोप से वह दुर्भिक्ष काल आवर्तं से ओर वनवायु से युक्त था । सभी जगहों में चटचट शब्द कर रही अग्नि की ज्वालाओं से सबके-सब जंगल उसमें पीले पड़ गये थे