Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 109, Verses 8–13

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 109, verses 8–13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 109 · श्लोक 8-13

संस्कृत श्लोक

प्राप्य तद्देशपर्यन्तं तत्र तालतरोस्तले । अवरोप्य सुतान्स्कन्धान्नानानर्थानिवोल्वणान् ॥ ८ ॥ विश्रान्तोऽस्मि चिरं श्रान्तो रौरवादिव निर्गतः । दीर्घदावनिदाघार्तो ग्रीष्मे पद्म इवाजलः ॥ ९ ॥ अथ चाण्डालकन्यायां विश्रान्तायां तरोस्तले । सुप्तायां शीतलच्छाये द्वौ समालिड्य दारकौ ॥ १० ॥ पृच्छको नाम तनयो ममैकः पुरतः स्थितः । अत्यन्तवल्लभोऽस्माकं कनीयान्मौग्ध्यवानिति ॥ ११ ॥ स मामुवाच दीनात्मा वाष्पपूर्णविलोचनः । तात देह्याशु मे मांसं पातुं च रुधिरं क्षणात् ॥ १२ ॥ पुनःपुनर्वदन्नेवं स बालस्तनयो मम । प्राणान्तिकीं दशां प्राप्तः साक्रन्दो हि पुनः क्षुधा ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

उस देश की सीमा में पहुँचकर वहाँ एक ताड के पेड़ के तले अपने कन्धे से बच्चों को, जो विविध अनर्थो के समान भीषण थे, उतारकर मैने चिरकाल तक विश्राम किया मेरी दशा बड़ी शोचनीय थी, रौरव नरक से निकले हुए पुरुष के सदृश मैं थका था और ग्रीष्म ऋतु के प्रचुर वनाग्नि के सन्ताप से पीड़ित मैं जल रहित कमल के सदृश मुरझाया था । तदुपरान्त चण्डाल की पुत्री के (मेरी पत्नी के) उस पेड़ के तले विश्राम लेने, दो लड़कों को छाती से लगाकर सो जाने पर पृच्छक नाम का एक लड़का मेरे आगे बैठा था, जो सबसे छोटा और बड़ा भोलाभाला होने के कारण हम दोनों का बड़ा दुलारा था । उसने दीन होकर और आँखों में आँसू भरकर मुझसे कहा : पिताजी मुझे जल्दी खाने के लिए मांस और पीने के लिए रुधिर दीजिये । बार-बार ऐसा कहता हुआ वह नन्हा-सा बच्चा प्राणान्तिक अवस्था को प्राप्त हुआ और मारे भूख के बार-बार रोने लगा