Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 11, Verses 30–32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 11, verses 30–32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 30-32
संस्कृत श्लोक
अत्यन्ताभावमस्यास्त्वं जगत्सर्गभ्रमस्थितेः ।
बुद्धैकध्याननिष्ठात्मा व्यवहारं करिष्यसि ॥ ३० ॥
भावाभावग्रहोत्सर्गस्थूलसूक्ष्मचलाचलाः ।
दृशस्त्वां वेधयिष्यन्ति न महाद्रिमिवेषवः ॥ ३१ ॥
स एषोऽस्त्येक एवात्मा न द्वितीयास्ति कल्पना ।
जगदत्र यथोत्पन्नं तत्ते वक्ष्यामि राघव ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
उसीसे आपकी दूसरी शंका निवृत्त हो जायेगी और दूसरी शंका की निवृत्ति होने पर
आपको शान्ति मिलेगी और लोकव्यवहार भी सिद्ध होगा, ऐसा कहते हैं।
आपको भ्रान्ति से जो यह जगत् की सत्ता दिखलाई दे रही है, इसके अत्यन्त अभाव को
(सर्वथा अभाव को) जानकर, आप अद्वितीय अखण्ड ब्रह्म के ध्यान में संलग्न हो लौकिक
व्यवहार करेगे । जिनका प्रयोजन रहने पर ग्रहण होता है और प्रयोजन न रहने पर त्याग होता
है, ऐसे स्थूल, सूक्ष्म आदि विषयोंमे (विषयों के अनुसार) चंचल और स्थिर व्यवहारदृष्टियाँ
आपको इस प्रकार पीड़ित नहीं कर सकेगी, जिस प्रकार कि बाण पर्वत को विद्ध नहीं कर
सकते | हे रघुकुलतिलक, जिसका पहले विस्तारसे वर्णन किया है, वही यह केवल एक
(अद्वितीय) आत्मा है । इसके सिवा दूसरी कल्पना ही नहीं है। इस द्वितीय-कल्पना से शून्य
आत्मा में यह जगत् जिस प्रकार उत्पन्न हुआ है, उसको मैं आगे आपसे कहूँगा । ये सम्पूर्ण
जगत् उस आत्मा से आविर्भूत हुए हैं