Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 11, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 11, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
वन्ध्यापुत्रनभोवृक्षकल्पना तावदस्ति हि ।
सा यथा नाशजन्माढ्या तथैवेदं न किं भवेत् ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
जगत् की उत्पत्ति प्रत्यक्ष प्रमाण से सिद्ध है, अतएव प्रथम तो उत्पक्तिमान् जगत् का
वन्ध्यापुत्र उपमान नहीं हो सकता, दूसरे अत्यन्त असत् कहीं उपमान नहीं देखा जाता, अतः
परिशेष से विकल्परूप वन्ध्यापुत्र आदि के ज्ञानको जगत् का उपमान मानना पड़ेगा । उसका
जन्म ओर नाश होता है, इसलिए उसका जगत् के साथ साद्रश्य भी हो सकता है, इस प्रकार
श्रीरामचन्दजी शंका करते है।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, वन्ध्यापुत्र ओर आकाशवृक्ष की तो कल्पना होती ही है ।
वह जैसे जन्म और नाश से युक्त हे, वैसे ही यह जगत् भी जन्म और नाश से युक्त क्यों नहीं
होगा ?