Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 110, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 110 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
अमृष्टसर्वभावानामलमात्मचमत्कृतिम् ।
मनः स्वाभिमताकारं रूपं सृजति वस्तुषु ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्वज्ञान होने पर मन क्यों नहीं घुमाता है ? इस पर कहते है ।
जिन्होंने पूर्णता का साक्षात्कार नहीं किया, उन्हींका मन पदार्थ में अभिमत आकारवाले
आत्मचमत्कारभूत रूप की सृष्टि करता है, तत्त्ववेत्ताओं का मन नहीं करता, क्योकि मिथ्याबुद्धि
से बाधित मनोविलासों में उनकी चमत्कार दृष्टि नहीं होती है, यह अभिप्राय हे