Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 110, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 110 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
चण्डालत्वं हि लवणे प्रतिभासवशाद्यथा ।
तथेदं जगदाभोगि मनो मननमात्रकम् ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे राजा लवण में भ्रमवश चण्डालता
स्फुरित हुई थी वैसे ही यह विशाल जगत् मन का स्फुरणरूप ही है