Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, Verse 64
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 110, verse 64 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 110 · श्लोक 64
संस्कृत श्लोक
यस्याचपलतां यातं मन एकत्र संस्थितम् ।
अनुत्तमपदेनासौ ध्यानेनानुगतोऽनघ ॥ ६४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे स्तम्भनास्त्र
से स्तब्ध हुआ शत्रु किसी प्रकार की चेष्टा नहीं करता है वैसे ही जिसका मन सद्वस्तु के सिवा
अन्यत्र कुछ चेष्टा नहीं करता, वही परमार्थ रूप से उत्तम पुरुष है, उससे अतिरिक्त पुरुष
कीचड़ के कीड़े हैं ॥६ ३॥ हे निष्पाप, एक स्थान में स्थित जिसका मन निश्चल हो गया है, वह
ध्यान से सर्वोत्तम पद यानी ब्रह्म से संगत हो गया यानी ब्रह्मीभूत हो गया