Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 110, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 110 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
सुरपत्तननिर्माणमसत्सदिव पश्यति ।
वासनावलितं चेतः स्वप्नवज्जाग्रदेव हि ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
वासनाओं से परिपूर्ण मन गन्धर्वनगर को, जो असत्
है, सत् के समान देखता है ओर जाग्रत को स्वप्न के सदुश देखता है