Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 111, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 111, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 111 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
अनुद्वेगः श्रियो मूलमनुद्वेगात्प्रवर्तते ।
जन्तोर्मनोजयो येन त्रिलोकीविजयस्तृणम् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
चिरकाल से मन के निग्रह में लगा हुआ पुरुष उद्वेग होने से उसका परित्याग न कर बैठे,
इसलिए उसके उत्साह को बढ़ाते हुए कहते हैं।
उद्वेग न होना राज्य आदि संपत्ति का कारण है, अनुद्धेग से जीव के मनोजय की सिद्धि
होती है जिस मनोजय से तीनों लोकों का विजय भी तृण के सदुश सहज हो जाता है