Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 111, Verse 46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 111, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 111 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
परमपावनया विमनस्तया समतया मतयात्मविदामपि ।
शमितया मितयान्तरहंतया यदवशिष्टमजं पदमस्तु तत् ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, आप एकमात्र संकल्परूप अपने
वैभव से, जिसने ब्रह्माण्ड आदि करोड़ों पदार्थो की भलीर्भोति रचना की हे, अतएव एकमात्र
संकल्प से ही जन्म, मरण आदि अत्यन्त अनर्थो का जिसने निर्माण किया है, ऐसे मन को
निरन्तरभावित, संकल्परहित, एकमात्र सन्तोषरूप वैभव से जीतकर विजय को (सर्वोत्किर्ष)
प्राप्त होडये ॥४ ५॥ आत्मज्ञानियों की भौ अभिमत, परम पवित्र, वैषम्यवृत्तिरहित विमनस्तता
से ओर शान्त की गई बहुत विपुल अहन्ता से भी अन्दर मेँ जो जन्म आदि विकारों के रहित यह
(तत्त्व) अवशिष्ट है, वही आपको प्राप्य हो