Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 112, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 112, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 112 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
मनसैव मनश्छित्त्वा पाशं परमबन्धनम् ।
उन्मोचितो न येनात्मा नासावन्येन मोक्ष्यते ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
परम बन्धन जालरूप मन को अपने मन से ही काट
कर जिसने अपनी आत्मा को नहीं छुड़ाया, उसकी मुक्ति अन्य से नहीं हो सकती