Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verses 32–33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 113, verses 32–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 32,33
संस्कृत श्लोक
सनितम्बस्तनी चित्रे न स्त्री स्त्रीधर्मिणी यथा ।
तथैवाकारचिन्तेयं कर्तुं योग्या न किंचन ॥ ३२ ॥
मनोराज्यमिवाकारभासुरा सत्यवर्जिता ।
सहस्रशतशाखापि न किंचित्परमार्थतः ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
इसकी वास्तव में कर्तृता क्यो नहीं है यदि ऐसी कोई जिज्ञासा करे, तो उसमें कर्तृत्व की
योग्यता न होने के कारण वह कर्ता नहीं है, ऐसा कहते हैं।
जैसे चित्र में लिखी गई नितम्ब, स्तन आदि अंगों से युक्त स्त्री गृहकार्य आदि करने में
समर्थ नहीं होती वैसे ही पहले अनुभूत पदार्थों की वासनारूप यह अविद्या कुछ भी करने की
योग्यता नहीं रखती । मनोराज्य के समान यह एकमात्र आकार से प्रकाशमान हे । वास्तविकता
का तो इसमें नामनिशान भी नहीं है । यद्यपि यह लाखों शाखा प्रशाखाओं से युक्त मालूम होती
है, तथापि परमार्थरूप से यह कुछ भी नहीं हे