Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verse 40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 113, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
जनेन दृश्यते वृद्धितत्परा नच वर्धते ।
विषास्वाद इवापातमधुराऽन्ते सुदारुणा ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
इसने परमात्मा को गर्भ मेँ कर रक्खा
है यानी आवृत कर रक्खा है, अतएव शरीर में लगने से दाह ओर क्लेश देनेवाली, जिसने जल
को गर्भ में धारण किया है, ऐसी घूपपंक्ति के समान यह शरीर में लगने से दाह ओर क्लेश
देनेवाली लोकों को आक्रान्त कर (तिरस्कृत कर) घूमती है । यह खूब लम्बी ओर जल से बनी
हुई मेघ की धारा के समान है ओर तृण समुह से दृढ़ रस्सी के समान असार(नाजुक) संसरणशील
संसार से दृढ़ हे । कवियों द्वारा कल्पनामात्र से वर्णित जलात्मक लहरों की श्रेणि के समान,
कीचड़ में प्रोढ कमलो की श्रेणि के समान और बहुत से छेदों से युक्त कमलनाल के समान यह
जडात्मक, पाप में प्रौढ ओर विविध छिद्रों से युक्त है ॥ ३ ७-३९॥ लोग इसे बढाने में तत्पर
दिखते हैं पर यह बढ़ती नहीं हे, विषमिश्रित मोदक के स्वाद के समान यह आपाततः मधुर
मालूम होती है, पर अन्त में महाभीषण रूप धारण करती है