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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verse 51

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 113, verse 51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 51

संस्कृत श्लोक

संध्यादिषु च कालेषु लोष्टपाषाणभित्तयः । अस्याः प्रसादात्दृश्यन्ते सर्पाजगरदृष्टिभिः ॥ ५१ ॥

हिन्दी अर्थ

इसीके प्रताप से सन्ध्या आदि कालों में ढेले, पत्थर ओर भीत साँप, अजगर आदि की भ्रान्ति से देखे जाते हैं