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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verses 54–55

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 113, verses 54–55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 54,55

संस्कृत श्लोक

न तदस्तीह यन्नाम न करोतीयमुद्धता । अस्यास्त्वकिंचनायास्तु शक्ततां पश्य राघव ॥ ५४ ॥ संरोधयेत्प्रयत्नेन संविदेवाशु संविदम् । सरित्स्रोतोनिरोधेन शुष्यत्येषा मनोनदी ॥ ५५ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामचन्द्रजी, ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जिसका यह उद्धत अविद्या निर्माण न करती हो । यद्यपि यह अपनी सत्ता में भी दरिद्र हे तथापि इसकी सामर्थ्य तो देखिये । यह क्या क्या नहीं कर डालती है ? जैसे विवेकबुद्धि से विषयबुद्धि का निरोध किया जाता हे वैसे ही विवेकबुद्धि से प्रयत्नपूर्वक वासनारूप अविद्या का शीघ्र निरोध करना चाहिये, जैसे स्रोतों को रोकने से नदी सूख जाती है वैसे ही इसके निरोध से यह मन रूपी नदी सूख जाती है