Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verse 58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 113, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
आलोकेन विनश्यन्त्या स्फुरन्त्या तमसोन्तरे ।
कौशिकेक्षणधर्मिण्या चित्रमन्धीकृतं जगत् ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
यह आलोक से
(आत्मप्रकाश से) नष्ट हो जाती है ओर अन्धकार के मध्य में खूब चमकती हे, अतएव यह
उल्लू के नेत्रो के सदुश हे । इसने जगत् को अन्धा बना रक्खा है, यह बड़े अचम्भे का विषय
है