Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verses 63–64
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 113, verses 63–64 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 63,64
संस्कृत श्लोक
स्वात्मान्धरूपास्पदया जडया जाड्यजीर्णया ।
दुःखदीर्घप्रलापिन्या चित्रमन्धीकृतं जगत् ॥ ६३ ॥
पुरुषासङ्गसङ्गिन्या रागिण्या क्रिययानया ।
विद्रवन्त्या विवक्षासु चित्रमन्धीकृतः पुमान् ॥ ६४ ॥
हिन्दी अर्थ
आत्मा के विषय में जो
अन्धरूप मूढ है, वे ही इसके आश्रय हैं, यह जड है, अपनी जडता से जीर्णशीर्ण हे, दुःखसे
दीर्घ प्रलाप करनेवाली है, अतएव पूर्वोक्त निशाचरी दीन-हीन स्त्री के तुल्य है । इसने जगत्
की आँखों में धूल क रक्खी है, यह कम अचम्भे की बात नहीं है । यह अविद्या पुरुष के साथ
एेक्याध्यास से पुरुष की संगिनी है तथा विविध विचित्र विषयों की कल्पन क्रिया से पुरुष का
भोग संपादन करने के कारण पुरुष की अनुरागिणी हे । स्वतत्त्वविचारों में भाग रही इसने पुरुष
को अन्धा बना डाला है, यह कम विचित्र नहीं है