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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, Verses 13–16

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 114, verses 13–16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 114 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

आब्रह्म स्तम्बपर्यन्तं तृणादि यदिदं जगत् । तत्सर्वं सर्वदात्मैव नाविद्या विद्यतेऽनघ ॥ १३ ॥ सर्वं च खल्विदं ब्रह्म नित्यं चिद्धनमक्षतम् । कल्पनान्या मनोनाम्नी विद्यते नहि काचन ॥ १४ ॥ न जायते न म्रियते किंचिदत्र जगत्त्रये । न च भावविकाराणां सत्ता क्वचन विद्यते ॥ १५ ॥ केवलं केवलाभासं सर्वसामान्यमक्षतम् । चेत्यानुपातरहितं चिन्मात्रमिह विद्यते ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त आत्मा की असंभावना के निवारणके लिए कार्यसहित अविद्या के उसमें बाध दशति हैं । हे पुण्यचरित श्रीरामचन्द्रजी, ब्रह्मा से लेकर पेड़ पौधों तक जो यह तृण आदिरूप जगत्‌ है, वह सब सदा आत्मा ही है, अविद्या तो है ही नहीं