Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, Verses 2–4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 114, verses 2–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 114 · श्लोक 2-4
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
यथा तुषारकणिका भास्करालोकनात्क्षणात् ।
नश्यत्येवमविद्येयं राघवात्मावलोकनात् ॥ २ ॥
तावत्संसारभृगुषु स्वात्मना सह देहिनम् ।
आन्दोलयति नीरन्ध्रदुःखकण्टकशालिषु ॥ ३ ॥
अविद्या यावदस्यास्तु नोत्पन्ना क्षयकारिणी ।
स्वयमात्मावलोकेच्छा मोहसंक्षयदायिनी ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी के पूछने पर वसिष्ठजी पहले अविद्या के क्षय का उपाय कहते हैं ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, जैसे सूर्य के दर्शन से पाला एक क्षण में नष्ट
हो जाता है, वैसे ही आत्मतत्त्व के साक्षात्कार से यह अविद्या नष्ट हो जाती है। यह अविद्या
तभी तक संसाररूपी पर्वत के ढूहों में (टीलों में), जो कि सघनकाँटेरूपी दु:खों से भरे हैं,
अपने साथ प्राणियों को अधःपात द्वारा लुढ़काती है, जब तक कि इसका विनाश करनेवाली
और मोह को दूर करनेवाली आत्म-साक्षात्कार की इच्छा स्वयं उत्पन्न नहीं हुई