Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, Verses 25–28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 114, verses 25–28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 114 · श्लोक 25-28
संस्कृत श्लोक
दृढा न याम्बरेऽत्रास्ति नलिनी हेमपङ्कजा ।
लोलवैदूर्यमधुपा सुगन्धितदिगन्तरा ॥ २५ ॥
उद्दण्डैः प्रकटाभोगैर्मृणालभुजमण्डलैः ।
विहसन्ती प्रकाशस्य शशिनो रश्मिमण्डलम् ॥ २६ ॥
विकल्पजालिकेवेत्थमसत्येवापि सत्समा ।
मनःस्वार्थविलासार्थं यथा बालेन कल्प्यते ॥ २७ ॥
तथैवेयमविद्येह भवबन्धनबन्धनी ।
चपला न सुखायैव बालेन कलिता दृढा ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
यद्यपि इस आकाश में जो
सुवर्ण के कमलों से भरी हुई, चंचल नीलमणिरूपी भँवरों से गुलजार, दिशाओंको सुगन्धित
करनेवाली, खूब बड़े-बड़े, प्रकट स्वरूपवाले मृणालरूपी भुजाओं से प्रकाशमान चन्द्रमा की
किरणों का उपहास कर रही ऐसी कमलिनी(कमलों से भरा हुआ तालाब) नहीं है, फिर भी
उसकी जैसे बालक अपने मनोरथ से विलास के लिए खूब दृढ़ रूप से कल्पना कर लेता है, वैसे
ही इस दो प्रकार की अविद्या की, जो कि इस प्रकार विकल्पसमूहों के तुल्य असत्य ही है तो भी
सत्य के तुल्य प्रतीत होती है, मुढ़जनों ने अत्यन्त क्लेश के लिए ही दृढरूप से कल्पना कर
रक्खी है। यह संसाररूपी बन्धन में डालनेवाली है और बड़ी चंचल है